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राजपूत युग (7 या 8वीं शताब्दी)

    राजपूत शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम कर्नल टाड़ ने आठवीं शताब्दी में लिखी एक पुस्तक Annals and History Rajsthan  में किया है। राजपूत शब्द एक जाति के रूप में अरब आक्रमण के बाद ही प्रचलित हुआ। भारतीय इतिहास में 7वीं से 12वीं शताब्दी के बीच का काल राजपूत काल के नाम से विख्यात है।
ऋग्वेद में राजन् शब्द का प्रयोग मिलता है। अर्थशास्त्र में इनके लिए राजपूत शब्द का प्रयोग किया गया युवांग च्वांग ने इन्हें क्षत्रिय कहा और अरब आक्रमण के बाद राष्ट्रकूट शब्द का प्रचलन हुआ। इनकी उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है।
राजपूतों की उत्पत्ति:-

  1. प्राचीन क्षत्रियों से:-गौरी शंकर ओझा जैसे इतिहासकार राजपूतों को प्राचीन क्षत्रियों से उत्पन्न मानते हैं इनके अनुसार प्राचीन क्षत्रिय ही आगे चलकर राजपूतों के नाम से प्रसिद्ध हो गये।
  2. विदेशी उत्पत्तिः-कुछ विदेशी इतिहासकार जैसे-कर्नलययड एवं स्मिथ आदि लोग विदेशी जातियों शक, कुषाण, सीथियन आदि से इनकी उत्पत्ति मानते हैं।
  3. लक्ष्मण से:- प्रतिहारों के अभिलेखों में इनकी उत्पत्ति लक्ष्मण से दर्शायी गई है। इनके अनुसार लक्ष्मण ने जैसे द्वारपाल के रूप में रामचन्द्र की रक्षा की थी उसी तरह प्रतिहारों ने आखों से भारत की। प्रतिहार का अर्थ ही द्वारपाल होता है।
  4. अग्निकुण्ड सिद्धान्त से:-चन्द्रबरदाई द्वारा लिखी पुस्तक पृथ्वीराज रासो में अग्निकुण्ड सिद्धान्त का उल्लेख प्राप्त होता है। यह कहानी के नवसहशांक चरित सूर्यमल के वंश भास्कर आदि में भी प्राप्त होता है।

पृथ्वी राज रासो के अनुसार गौतम अगस्त, वशिष्ठ आदि तीनों में आबू पर्वत पर एक यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ से उन्होंने तीन योद्धाओं प्रतिहार, चालुक्य एवं परमार को पैदा किया। बाद में चार भुजाओं वाले एक अन्य योद्धा चाहवान की उत्पत्ति की। इस प्रकार अग्नि कुण्ड सिद्धान्त से कुल चार राजपूतों की उत्पत्ति दर्शायी गयी है।
अग्निकुंड सिद्धान्त का विशेष महत्व है क्योंकि अग्नि पवित्रता का प्रतीक है। ऐसा लगता है कि कुछ विदेशी लोगों को भी अग्नि के माध्यम से पवित्र कर राजपूतों में शामिल कर लिया गया।
त्रिपक्षीय संघर्ष:- हर्ष की मृत्यु के बाद कन्नौज पर अधिकार को लेकर प्रतिहारों, पालों और राष्ट्रकूटों के बीच 8वीं शताब्दी के मध्य से 10वी शताब्दी के मध्य एक संघर्ष प्रारम्भ होता है जो भारतीय इतिहास में त्रिपक्षीय संघर्ष के नाम से विख्यात है। इस संघर्ष में अन्ततः प्रतिहारों की विजय होती है तथा उनका कन्नौज पर अधिकार स्थापित हो जाता है। प्रतिहारों के पतन के बाद कन्नौज पर गहड़वालों का आधिपत्य हो जाता हे। ये काशी नरेश के नाम से विख्यात थे। प्रतिहारों के पतन के बाद उत्तर भारत में कुछ अन्य छिटपुट राजवंशों का उदय भी होता है। इनमें दिल्ली तथा अजमेर के चाहमान, बुन्देलखण्ड के चन्देल मालवा के परमार, और त्रिपुरी के कल्चुरी शामिल थे। इन सभी राजवंशों में परमार, राष्ट्रकूटों के सामन्त माने जाते हैं जबकि शेष अन्य प्रतिहारों के।
त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लेने वाले शासक:-

प्रतिहार वंश           राष्ट्रकूट वंश               पालवंश
1. वत्सराज               1. ध्रुव                        1. धर्मपाल
2. नागभट्ट द्वितीय     2. गोविन्द तृतीय         2. देवपाल
3. रामभद्र                3. अमोघवर्ष प्रथम      3. विग्रह पाल
4. मिहिर भोज          4. कृष्ण द्वितीय           4. नारायण पाल
5. महेन्द्र पाल

हर्ष की मृत्यु के बाद कन्नौज पर आयुध शासकों का शासन था। इनमें दो भाइयों चक्रयुध एवं इन्द्रायुध को लेकर गद्दी के लिए संघर्ष चल रहा था। इसी समय प्रतिहारों पालों एवं राष्ट्रकूटों ने हस्तक्षेप किया।

प्रतिहार वंश

संस्थापक:- हरिश्चन्द्र जो ब्रहमक्षत्री था।
राजधानी:- कन्नौज परन्तु प्रारम्भिक राजधानी भिन्न माल (गुजरात में स्थित है)
1. नागभट्ट प्रथम (730-56):- इस वंश का यह वास्तविक संस्थापक था। ग्वालियर अभिलेख से पता चलता है कि इसने अरबों को पराजित किया था।
2. वत्सराज (778-805) 
3. नागभट्ट द्वितीय (805-833)
4. रामभद्र (833-836)    

5. मिहिर भोज (836-82):- यह प्रतिहार वंश का महानतम शासक था। इसके स्वर्ण सिक्के पर आदि वाराह शब्द का उल्लेख मिलता है जिससे इसका वैष्णव धर्मानुयायी पता चलता है। इसी के समय में अरब यात्री सुलेमान भारत आया जिसने इस शासक की बहुत प्रशंसा की है। इसी ने भिन्न माल से अपनी राजधानी कन्नौज स्थानान्तरित की।
6. महेन्द्र पाल प्रथम (885-910):- यह प्रतिहार वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था। इसके समय में इस राजवंश का सर्वाधिक विस्तार हुआ। इसके दरबार में संस्कृत का प्रसिद्ध विद्वान राजशेखर रहता था। उसने निम्नलिखित प्रसिद्ध ग्रन्थ लिखे-काब्य मीमांसा, कर्पूरमंजरी, भिदूशाल भंजिका, बालरामायण, भुव कोष, हरविलास।
राजशेखर कुछ समय के लिए त्रिपुरी के कल्चुरी के वंश में चला गया था और वहाँ के शासक के यूरवर्ष या युवराज प्रथम के काल में अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ काब्य मीमांसा तथा कर्पूर मंजरी की रचना की।
7. भोज द्वितीय (910-12):-    8. महीपाल (912-44)ः-इसी के समय में ईराक का यात्री अलमसूरी भारत आया। राजशेखर इसके दरबार से भी सम्बन्धित था।
9. महेन्द्रपाल द्वितीय (944-46)  
10. देवपाल (946-49)
11. विनायक पाल (949-54 ई0)    राज्यपाल (1018):-
इसी के समय में महमूद गजनवी ने 1018 ई0 में कन्नौज पर आक्रमण किया। राज्यपाल अपनी राजधानी छोड़कर भाग खड़ा हुआ। इस वंश का अन्तिम शासक यशपाल था। इसी के बाद कन्नौज के गहड़वालों ने अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया और उन्होंने गहड़वाल वंश की नींव डाली।

राष्ट्रकूट वंश

संस्थापकः– दन्तिदुर्ग
राजधानी:– मान्यखेत या  मात्यखण्ड (आ0 आन्ध्रप्रदेश)
दन्तिदुर्ग (752-56) –यह चालुक्यों का सामन्त था इसने आधुनिक आन्ध्रप्रदेश में अपने राज्य की स्थापना की। राष्ट्रकूट लोग मुख्यतः लाट्टलर (वर्तमान आन्ध्र प्रदेश) के निवासी माने जाते है। यह ब्राह्मण धर्मावलम्बी था तथा उज्जैन में अनेक यज्ञ किये।
कृष्ण प्रथम (756-73):- इसने एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मन्दिर का निर्माण करवाया।
गोविन्द द्वितीय (773-80)
ध्रुव (780-93):-
राष्ट्रकूटों की तरफ ने त्रिपक्षीय संघर्ष में इसी शासक ने भाग लिया। इसका एक नाम धारावर्ष भी है।
गोविन्द तृतीय (793-814):- यह राष्ट्रकूट वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था।
अमोघवर्ष (814-78):- अमोघवर्ष ने एक नये नगर मान्यखेत या माल्यखण्ड का निर्माण किया और अपनी राजधानी एलिचुर अथवा बरार से यहीं स्थानान्तरित की। यह स्वयं भी विद्वान था और अन्य विद्वानों का आश्रयदाता भी था। इसने कन्नड़ भाषा में एक प्रसिद्ध ग्रन्थ कविराज मार्ग की रचना की। इसके दरबार में निम्न महत्वपूर्ण विद्वान भी थे।
1. जिनसेन    –           आदिपुराण
2. महावीराचार्य    –    गणितारा संग्रह
3. शक्तायना    –        अमोघवृत्ति
वैसे तो अमोघवर्ष जैन धर्म का उपासक था परन्तु संजन ताम्रपत्र से पता चलता है कि एक अवसर पर इसने अपने बायें हाथ की अंगुली देवी को चढ़ा दी थी।
कृष्ण द्वितीय (878-914)        
इन्द्र तृतीय (915-927):-इसके समय ही ईराकी यात्री अल-मसूरी भारत आया था। उसने इन्द्र तृतीय को भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक बताया।
कृष्ण तृतीय (939-965):- कृष्ण तृतीय ने अपने समकालीन चोल शासक परान्तक प्रथम को तक्कोलम के युद्ध में पराजित किया। इसने रामेश्वरम् तक धावा बोला तथा वहीं एक विजय स्तम्भ तथा एक देवालय की स्थापना करवाई।
खोटिटग (965-72)-इसके समय में परमार नरेश सीयक ने राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेत पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दिया।
कर्क द्वितीय (972-74):- इसके सामन्त तैल द्वितीय ने इस पर आक्रमण कर इसे पराजित कर दिया। तैल ने जिस नये वंश की नींव रखी उसे कल्याणी के पश्चिमी चालुक्या कहा जाता है।

पालवंश

संस्थापक-गोपाल            
राजधानी-नदिया
शशांक की मृत्यु के बाद बंगाल में 100 वर्षों तक अराजक्ता ब्याप्त रही तब नागरिकों ने स्वयं इससे ऊबकर एक बौद्ध मतानुयायी गोपाल को अपना शासक बनाया। गोपाल ने जिस वंश की नींव रखी उसे पाल वंश कहा जाता है।
गोपाल (750-770):- गोपाल बौद्ध धर्म मतानुयायी था। इसे आम जनता ने गद्दी पर बैठाया (मध्य काल में फिरोज तुगलक और रजिया ऐसे दो शासक थे जो जनता द्वारा बैठाये गये)/ इसने बंगाल में ओदन्तपुरी विद्यालय की स्थापना की।
धर्मपाल (770-810 ई0):-
 1. उपाधि:- परमसौगत, अन्य उपाधियों उत्तरपथ स्वामी (यह उपाधि गुजरात कवि सोडढल ने इसे प्रदान की।
2. इसने प्रसिद्ध विद्यालय विक्रमशिला की स्थापना की।
3. नालन्दा विश्वविद्यालय के खर्च के लिए दो सौ ग्राम दान में दिये।
4. इसने बंगाल के प्रसिद्ध सोमपुरी बिहार की स्थापना की जो इसके पूर्व में पड़ता है।
प्रसिद्ध लेखक ताराचन्द्र ने लिखा है कि इसने बंगाल में 50 से अधिक धार्मिक विद्यालयों की स्थापना करवाई थी। इसके दरबार में प्रसिद्ध बौद्ध लेखक हरिभद्र निवास करता था।
देवपाल (810-50):- उपाधि,- परमसौगत
यह बंगाल के शासकों में सबसे शक्तिशाली शासक था। इसने समकालीन प्रतिहार नरेश मिहिरभोज को पराजित किया। अरब यात्री सुलेमान इसके समय में भी भारत आया था तथा इसे अत्यन्त श्रेष्ठ शासक बताया है। इसके समय में शैलेन्द्र वंशी शासक बालपुत्र देव ने नालन्दा में एक बौद्ध मठ की स्थापना की। इसके खर्च हेतु देवपाल ने पाँच ग्राम दान में दिये।
इसने अपनी राजधानी नदिया से मुगेर में स्थानान्तरित कर ली। 850 से 988 इ्र0 तक पाल वंश का इतिहास पतन का काल माना जाता है। इस समय के शासकों के नाम नहीं प्राप्त होते हैं इसी के बाद महीपाल गद्दी पर बैठता है।
महीपाल (988-1038):- चूँकि महीपाल ने दुबारा पाल वंश की शक्ति को स्थापित किया इसी लिए इसे पालवंश का द्वितीय संस्थापक कहा जाता है। परन्तु इसके काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना चोल शासक राजेन्द्र चोल का इसके राज्य पर आक्रमण था। राजेन्द्र चोल ने इसे पराजित कर गंगइकोंडचोल चोल की उपाधि धारण की।
नयपाल (1038-55)      
रामपाल (1077-1120):- रामपाल के समय में भारतीय इतिहास का प्रथम कृषक विद्रोह हुआ। यह कैवर्त (केवट) जातियों द्वारा किया गया इसका पता सन्ध्याकर नन्दी की पुस्तक रामचरित से चलता है। (आधुनिक काल में पहला कृषक विद्रोह नील विद्रोह माना जाता है।
इसने मध्य-प्रदेश में जगदलपुर में एक विद्यालय की स्थापना की।
रामपाल के बाद मदन पाल ने 1161 ई0 तक राज किया। इसके बाद पालों की सत्ता सेन वंश के हाथों चली गई।

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