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मौर्याेत्तरकालीन राजव्यवस्था एवं प्रशासन (Post-Mauryan Polity And Administration)

  • इस काल में अधिकतर छोटे-छोटे राज्य थे। यद्यपि उत्तर में कुषाणों एवं दक्षिण में सातवाहनों ने काफी विस्तृत प्रदेशों पर राज किया किन्तु न तो सातवाहन और न तो कुषाणों के राजनीतिक संगठन में वह केन्द्रीयकरण था जो मौर्य प्रशासन की प्रमुख विशेषता थी। इन दोनों ही राजवंशों के शासकों ने कई छोटे-छोटे राजाओं से सामंती संबंध स्थापित किये थे। सातवाहन शासकों के कई अधीनस्थ शासक थे, जैसे-इक्ष्वाकु आदि, जिन्होंने सातवाहन शासकों के पतन होने पर स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिये।
  • मौर्योत्तर काल में विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखने के लिए राजतंत्र में दैवीय तत्वों को समाविष्ट करने की प्रवृत्ति अपनायी गई। पहले राजाओं से देवता की तुलना की जाती थी किन्तु अब राजाओं की तुलना देवताओं से की जाने लगी। जैसे-सातवाहन राजा गौतमीपुत्र शातकर्णी की तुलना कई देवताओं से की गयी है तथा कुषाण राजाओं को देवपुत्र कहा गया है। राजाओं के इस दैवीकरण से उनकी सत्ता एवं उनके नियंत्रण में कोई वृद्धि नहीं हुई।
  • सातवाहन शासकों ने ब्राह्मणों एवं बौद्ध श्रमणों को राजस्व एवं प्रशासनिक करों से मुक्त भूमि प्रदान करने की प्रथा प्रारंभ की।
  •  प्रशासन की सुविधा के लिए सातवाहन साम्राज्य को अनेक विभागों में बाँटा गया था जिन्हें आहार कहा जाता था। प्रत्येक आहार का शासन एक अमात्य के अधीन होता था। सातवाहन काल के पदाधिकारियों में भाण्डारगारिक (कोषाध्यक्ष), रज्जुक (राजस्व विभाग का प्रभुत्व), पनियधरक (नगरों में जलपूर्ति का प्रबंध करने वाला अधिकारी), कर्मान्तिक (भवनों के निर्माण की देखरेख करने वाला), सेनापति इत्यादि थे। आहार के नीचे ग्राम होते थे। प्रत्येक ग्राम का अध्यक्ष एक ’ग्रामिक’ होता था, जो ग्राम शासन के लिए उत्तरदयी था। हाल रचित ’गाथासप्तसती’ में ग्रामिक (ग्रामणी) का उल्लेख मिलता है। उसके अधिकार में 5 से 10 गाँव होते थे। नगरों का शासन ’निगम सभा’ द्वारा संचालित होता था। संभवतः ग्रामों और निगमों को स्वशासन के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता दी गयी थी।
  • समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति लेख से पता चलता है कि कुषाण राज्य में ’विषय’ तथा ’मुक्ति’ जैसी प्रशासनिक इकाईयाँ होती थी। कुषाण लेखों से पहली बार ज्ञात होता है कि दण्डनायक तथा महादण्डनायक जैसे पदाधिकारी विद्यमान थे। संभवतः वे सैनिक अधिकारी थे। साम्राज्य सैनिक शक्ति के आधार पर स्थापित हुआ था इसीलिए वह स्थायी नहीं रहा।

मौर्योत्तरकालीन समाज (Post-Mauryan Society)

  • सातवाहनकालीन समाज वर्णाश्रम धर्म पर आधारित था। इस काल में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोपरि था क्योंकि सातवाहन नरेश स्वयं ब्राह्मण थे। नासिक प्रशस्ति में गौतमीपुत्र को ’अद्वितीय ब्राह्मण’ कहा गया है। इस समय तक अनेक नई-नई जातियाँ व्यवसायों के आधार पर संगठित होने लगी थी। इस काल के समाज की प्रमुख विशेषता शकों तथा यवनों का भारतीय संस्कृति में समाहित होना था क्योंकि अनेक शकों के नाम भारतीय नामों की तरह थे, जैसे धर्मदेव, ऋषभदत्त, अग्निवर्मन आदि।
  • यद्यपि सातवाहन शासकों ने वर्ण संकरता को रोकने का प्रयास किया था किन्तु इस समय अन्तर्जातीय विवाह होते थे। शातकर्णी प्रथम ने अंग कुल की महारठी (क्षत्रिय) की पुत्री नागनिका से तथा वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी ने रुद्रदामन की पुत्री से विवाह किया था।
  • समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी। कभी-कभी वे शासन के कार्यों में भी भाग लेती थीं। सातवाहन शासकों के नाम का मातृप्रधान होना स्त्रियों की अच्छी दशा को दर्शाता है। धार्मिक कार्यों में पति के साथ स्त्रियों की अच्छी दशा को दर्शाता है। धार्मिक कार्यों में पति के साथ स्त्रियाँ भाग लेती थी।
  • सातवाहन शासकों का शासनकाल दक्षिण भारत में वैदिक एवं बौद्ध धर्म की संपन्नता का काल था। शातकर्णि प्रथम ने अनेक वैदिक यज्ञों का आयोजन किया था तथा इस अवसर पर उसने गाय, हाथी, भूमि आदि दक्षिणा स्वरूप ब्राह्मणों को दान किया था। उसने अपने पुत्र का नाम वेद श्री रखा तथा संकर्षण, वासुदेव, इन्द्र, सूर्य आदि की पूजा की। हाल रचित ’गाथासप्तशती’ के प्रारम्भ में ही शिव की पूजा की गई है। गौतमी पुत्र शातकर्णी को वेदों का आश्रय कहा गया है।
  • सातवाहन शासक ब्राह्मण होते हुए भी धर्म सहिष्णु थे। उन्होंने अपने शासनकाल में बौद्ध धर्म को संरक्षण प्रदान किया था सातवाहनकालीन दक्कन की सभी गुफायें बौद्ध धर्म से ही सम्बन्धित हैं। सातवाहन काल में स्तूप, बोधिवृक्ष, बुद्ध के चरणचिन्ह, धर्मचक्र, त्रिशुल, बुद्ध तथा अन्य बड़े संतों के धातु अवशेषों की पूजा-अर्चना की जाती थी।

मौर्योत्तरकालीन अर्थव्यवस्था(Post-Mauryan Econom) 

इस काल में अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव यह आया कि इस समय आर्थिक गतिविधियों में राजकीय हस्तक्षेप कम हो गया। यह बदलाव निम्न कारणों से हुआ-

  • छोटे-छोटे राज्यों का उदय होना।
  • राज्यों का आपस में संघर्षरत होना।
  • मौर्यों की तरह विशाल अधिकारी वर्ग का न होना।

इन परिवर्तनों के बावजूद भी मौर्योत्तर काल नगरीकरण के चरमोत्कर्ष को दर्शाता है। इस काल में सैकड़ों की संख्या में नगरों का उदय हुआ जिसकी बुनियाद बौद्ध युग में पड़ गयी थी।

कृषि क्षेत्र में परिवर्तन (Change In Agriculture Sector)

मौर्यों की तरह कृषि इस काल में राजकीय उद्यम नहीं रहा लेकिन भूमि पर राजकीय स्वामित्व की अवधारणा अब भी मौजूद थी। राजा के द्वारा भूमि दान दिये जाने का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य सातवाहन काल में दिखायी पड़ता है लेकिन भूमिदान के बावजूद राज्य राजस्व पर से अपना दावा नहीं छोड़ता था। कुषाणों के समय भू-राजस्व के स्थायी दान (अक्षयनीवि) की परम्परा की शुरूआत हुई जो गुप्तकाल में जाकर और विस्तृत हुई। राज्य के द्वारा सिंचाई का समुचित प्रबंध करने के भी प्रमाण मिलते हैं। रूद्रदामन के अभिलेख से इसके साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। कुषाण एवं सातवाहन शासकों ने तालाबों का निर्माण करवाया था।
कर  निर्धारित एवं वसूल करने वाले अधिकारियों आदि की स्पष्ट जानकारी इस काल में नहीं मिलती हैं। ईसापूर्व और ईसा की सदी के प्रारंभ में व्यापार के विकास के साथ ही मुद्रा व्यवस्था के विकास पर प्रकाश पड़ता है। उत्तर में हिन्द-यवन शासकों ने सोने के सिक्के चलाए। कुषाण शासकों ने भी बहुत बड़ी मात्रा में सोने के सिक्के चलाये। वस्तुतः सोने एवं चाँदी के सिक्के दैनिक जीवन में प्रयुक्त नहीं होते थे, इसीलिए दैनिक जीवन के उपयोग के लिए कुषाणों ने ताँबे के सिक्के चलाये।

उद्योग एवं शिल्प (Industries And Crafts)

प्राचीन भारतीय इतिहास में शिल्पों का सर्वाधिक विकास मौर्योत्तर काल में हुआ। यह काल भारतीय इतिहास में शिल्पों में विविधता के लिए जाना जाता है। चीनी रेशम के आयात से देश में रेशम उद्योग को प्रोत्साहन मिला। मौर्योत्तर काल में उत्पादन के विभिन्न क्षेत्रों में तकनीकी विकास भी हुआ।
प्रत्येक व्यावसायिक संघ की अलग-अलग श्रेणी होती थी जिसका प्रधान श्रेष्ठिन कहा जाता था। श्रेणी के कार्यालय को निगम सभा कहते थे। श्रेणियों के अपने व्यापारिक नियम होते थे जिन्हें श्रेणी धर्म कहा जाता था। इन्हें राजा की ओर से मान्यता प्रदान की गयी थी। वे बैंकों की तरह कार्य करते थे। नासिक लेख से पता चलता है कि गोवर्धन में बुनकरों की एक श्रेणी के पास 2000 कार्षापण की एक अक्षयनीवी (स्थायी निवेश की पूँजी) एक प्रतिशत मासिक ब्याज की दर पर जमा की गयी थी।

व्यापार(Trade)

मध्य एशियाई लोगों के आने से मध्य एशिया और भारत के मध्य व्यापारिक संपर्क स्थापित हुए। फलतः भारत को मध्य एशियाई देशों से भारी मात्रा में सोना प्राप्त हुआ। भारत का व्यापारिक संबंध रोम से भी था, क्योंकि प्लिनी कहता है कि भारतीय वस्तुओं के बदले रोमन साम्राज्य भारी मात्रा में बुलियन भारत को दे रहा है। कुषाणों ने रेशम मार्ग पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया जिससे इन्हें भारी मात्रा में सोना प्राप्त हुआ।
इस काल में पश्चिम एशिया से खजूर तथा घोड़ा, श्रीलंका से मसाला, चीन से रेशम, इथोपिया से हाथी दाँत आदि का आयात किया जाता था। यहाँ से निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में काली मिर्च, तेजपत्ता, लौंग, इलायची, सूती वस्त्र, हाथी दाँत के सामान आदि सम्मिलित थे।

मौर्योत्तरकालीन कला (Post-Mauryan Art)
मौर्योत्तर काल में कला का आधार मुख्यतः बौद्ध धर्म ही रहा। इस काल में धनी व्यापारियों की विभिन्न श्रेणियों एवं शासकों द्वारा कला को प्रश्रय प्रदान किया गया। इस काल में स्मारक, स्तूप, गुहा मंदिर (चैत्य) एवं विहार का निर्माण हुआ।
सातवाहन काल में पश्चिमी दक्कन में अत्यंत कुशलता के साथ ठोस चट्टानों को काटकर अनेक चैत्य और विहारों का निर्माण हुआ। इस समय चैत्य बौद्धों के मंदिर के रूप में तथा विहार भिक्षु निवास के रूप में उपयोग होता था। इस काल का सबसे प्रसिद्ध चैत्य कार्ले का है। यह लगभग 40 मीटर लम्बा और 15 मीटर ऊँचा है। यह विशाल शिला-वास्तुकला का उदाहरण है।
वस्तुतः विहार चैत्यों के पास बनाए गए। उनका उपयोग वर्षा काल में भिक्षुओं के निवास के लिए होता था। नासिक में तीन विहार के अवशेष प्राप्त हुए हैं। उनमें नहपान और गौतमीपुत्र के अभिलेख हैं। कृष्णा गोदावरी क्षेत्र में अमरावती और नागार्जुनीकोंड के स्तूप प्रसिद्ध हैं। नागार्जुनीकोंड सातवाहनों के उत्तराधिकारियों के काल की सर्वोत्कृष्ट कला थीं। यहाँ पर बौद्ध स्मारक ही नही बल्कि सबसे पुराने ईंट के बने हिन्दू मंदिर भी हैं।

जैन धर्म के अनुयायियों ने मथुरा में मूर्तिकला की एक विशिष्ट शैली का प्रार्दुभाव किया। वस्तुतः यह कला शैली ’मथुरा शैली’ के नाम से विख्यात हुई। कालांतर में कुषाणों के संरक्षण में यह शैली और भी विकसित हुई। केवल मथुरा से इस शैली के अनेक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जैसे मूर्तियाँ, आयागपट्ट आदि जो कुषाणकालीन हैं और जिससे जैन धर्म के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश पड़ता है। मूर्तियाँ लाल बलुआ पत्थर से बनती थी। यह कला आदर्शवादी थी। सारनाथ की खड़ी बौद्ध मूर्ति का निर्माण मथुरा में हुआ था।
ईसापूर्व प्रथम शताब्दी के मध्य से उत्तर-पश्चिम में गांधार में कला की एक और शैली का विकास हुआ जिसे गांधार शैली कहते हैं। गांधार कला के अन्तर्गत मूर्तियों में शरीर की आकृति को सर्वथा यथार्थ दिखाने का प्रयत्न किया गया है। इस काल की विषय वस्तु बौद्ध परंपरा से ली गई थी। किन्तु निर्माण का तरीका यूनानी था। प्रारंम्भिक बुद्ध मूर्तियों का मुख ग्रीक देवता अपोलो से मिलता जुलता था।

इसी काल में विन्ध्य से दक्षिण में अनेक स्थानों से सुंदर कलाकृतियाँ पाई गई। दक्कन (महाराष्ट्र) में चट्टानों को काटकर सुंदर गुफाएँ बनाई गई। आंध्र प्रदेश में नार्गाजुनीकोंउ और अमरावती बौद्ध केन्द्र के रूप में विकसित हुए। बौद्ध धर्म से संबंधित सबसे पुराने पट्टचित्र गया, साँची और भरहुत में पाये गये हैं।
मौर्योत्तर काल में चित्रकला के सबसे अधिक प्राचीन उदाहरण अजंता की गुफा संख्या 9 व 10 में मिलते हैं। गुफा संख्या 9 में क्रमशः सोलह उपासकों को स्तूप की ओर बढ़ते हुए दिखाया गया है जबकि गुफा संख्या 10 में जातक कथाएँ अंकित हैं। इस काल की चित्रकला बौद्ध धर्म से संबंधित थी।

मौर्योत्तरकालीन साहित्य(Post Mauryan Literature)

  • इस काल में साहित्य रचना में संस्कृत भाषा का प्रचलन अधिक था।
  • पतंजलि ने महाभाष्य की रचना की, जो उनके पूर्ववर्ती व्याकरणाचार्य पाणिनी की प्रसिद्ध रचना अष्टाध्यायी की टीका है।
  • सबसे प्रसिद्ध स्मृति मनुस्मृति ई.पू. दूसरी सदी से ईसा की दूसरी सदी के मध्य लिखी गई।
  • अश्वघोष रचित सौन्दरानंद, बुद्ध के सौतेले भाई आनंद के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के प्रसंग पर आधारित हैं।
  • अश्वघोष के नाटकों के कुछ भाग मध्य एशिया के एक विहार में प्राप्त हुए हैं।
  • रूद्रदामन का गिरनार अभिलेख संस्कृत काव्य का अनूठा उदाहरण है।
  • कुषाण साम्राज्य के सुई विहार के अभिलेख में भी संस्कृत का प्रयोग हुआ है।

          मौर्योत्तर साहित्य

गाथा सप्तशती               –      हाल
महाभाष्य                      –      पतंजलि
चरक संहिता                 –    चरक
नाट्यशास्त्र                    –    भरत
कामसूत्र                        –    वात्स्यायन
सौन्दरानंद, बुद्ध चरित    –    अश्वघोष
स्वप्नवासवदत्ता               –    भास

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